SEBI proposes two options for derivatives settlement and closing auction timing

डेरिवेटिव्स सेटलमेंट और क्लोजिंग ऑक्शन टाइमिंग पर सेबी के दो विकल्प, 3 अक्टूबर तक मांगी राय

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नई दिल्ली। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड यानी सेबी ने क्लोजिंग ऑक्शन सेशन यानी CAS में बदलाव का प्रस्ताव रखा है। इसमें एक्सपायरी वाले दिन इंडेक्स और सिंगल स्टॉक डेरिवेटिव्स के सेटलमेंट प्राइस तय करने के लिए दो विकल्प दिए गए हैं। साथ ही ऑक्शन शुरू होने से पहले का ट्रांजिशन पीरियड घटाने और इंडिकेटिव इंडेक्स वैल्यू को हटाने का प्रस्ताव है। सेबी ने इन प्रस्तावों पर सार्वजनिक टिप्पणियां 3 अक्टूबर तक मांगी हैं।

सेबी के पहले विकल्प के तहत एक्सपायरी वाले दिन सेटलमेंट प्राइस तय करने के लिए ब्लेंडेड VWAP यानी वॉल्यूम वेटेड एवरेज प्राइस पद्धति अपनाई जा सकती है। इसमें लगातार कारोबार के आखिरी 30 मिनट और CAS के 10 मिनट के दौरान हुए ट्रेड को शामिल किया जाएगा। इसमें दोनों अवधि को कोई तय वजन नहीं दिया जाएगा, बल्कि वास्तविक ट्रेडेड वैल्यू के आधार पर योगदान तय होगा। उदाहरण के लिए, यदि कुल ट्रेडेड वैल्यू में लगातार कारोबार की हिस्सेदारी 90 प्रतिशत और CAS की 10 प्रतिशत रही, तो ब्लेंडेड कीमत में CAS का योगदान भी 10 प्रतिशत होगा।

दूसरे विकल्प के तहत कम से कम एक साल के लिए मौजूदा VWAP आधारित पद्धति पर अस्थायी रूप से वापस जाने का प्रस्ताव है।

मार्केट टाइमिंग को लेकर भी सेबी ने दो विकल्प दिए हैं। पहले विकल्प में CAS वाले शेयरों में लगातार कारोबार शाम 3:30 बजे तक जारी रहेगा और उसके बाद ऑक्शन होगा। इस स्थिति में डेरिवेटिव्स कारोबार 3:45 बजे तक जारी रह सकता है। दूसरे विकल्प में CAS वाले शेयरों के लगातार कारोबार का मौजूदा 3:15 बजे का कटऑफ बरकरार रहेगा, जबकि डेरिवेटिव्स कारोबार 3:30 बजे समाप्त होगा।

दोनों विकल्पों में लगातार कारोबार और CAS के बीच का ट्रांजिशन पीरियड 5 मिनट से घटाकर 1 मिनट करने का प्रस्ताव है। CAS के बाद डेरिवेटिव्स कारोबार की अतिरिक्त विंडो भी 10 मिनट से घटाकर 5 मिनट की जाएगी।

सेबी ने CAS के दौरान एक्सचेंजों द्वारा इंडिकेटिव इंडेक्स वैल्यू जारी करना बंद करने का प्रस्ताव दिया है। नियामक का मानना है कि इससे ऐसी इंडेक्स वैल्यू को वास्तविक ट्रेडेड वैल्यू समझने की गलतफहमी से बचा जा सकेगा। हालांकि, व्यक्तिगत शेयरों के लिए इंडिकेटिव इक्विलिब्रियम प्राइस जारी करने की व्यवस्था जारी रह सकती है।

नियामक ने यह भी प्रस्ताव दिया है कि रेफरेंस प्राइस से 1 प्रतिशत से ज्यादा दूर लगाए गए ऑर्डर को कैंसिल करने की सुविधा सीमित की जाए, जबकि कीमत में सुधार करने वाले संशोधन की अनुमति रहे। CAS शुरू होने के समय मौजूद अनएक्जीक्यूटेड Iceberg ऑर्डर्स को पूरी जानकारी के साथ सामान्य लिमिट ऑर्डर में बदलने का विकल्प भी प्रस्तावित है।

ये बदलाव 3 अगस्त को CAS लागू किए जाने के एक महीने से अधिक समय बाद प्रस्तावित किए गए हैं। CAS में पहले इस्तेमाल होने वाली VWAP पद्धति की जगह ऑक्शन व्यवस्था लाई गई थी, जिसमें खरीद और बिक्री के ऑर्डर मिलाकर इक्विलिब्रियम प्राइस तय किया जाता है। हालांकि, कम लिक्विडिटी के कारण एक्सपायरी वाले दिनों में ऑक्शन के दौरान कीमतों में तेज उछाल और अस्थिरता देखने को मिली।

सेबी के आंकड़ों के अनुसार, CAS लागू होने के बाद अध्ययन की गई पांच एक्सपायरी में 10 मिनट के ऑक्शन के दौरान औसत प्रीमियम टर्नओवर प्रति मिनट NSE पर 189.82 करोड़ रुपए और BSE पर 288.94 करोड़ रुपए रहा। इसकी तुलना में CAS से पहले के समान 30 मिनट में यह क्रमशः 126.31 करोड़ रुपए और 141.48 करोड़ रुपए था। इससे संकेत मिलता है कि क्लोजिंग अवधि में डेरिवेटिव्स गतिविधि काफी मजबूत बनी हुई है।

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