मुंबई। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज यानी NSE के 22,000 करोड़ रुपए से ज्यादा के आईपीओ की कीमत बाजार की उम्मीदों से कम रहने के कारण कई मौजूदा शेयरधारकों ने अपनी प्रस्तावित हिस्सेदारी बिक्री घटा दी है। आईपीओ के लिए 1,700 से 1,785 रुपए प्रति शेयर का प्राइस बैंड तय किया गया है, जबकि बाजार में NSE का वैल्यूएशन 2,000 रुपए प्रति शेयर से ज्यादा रहने की उम्मीद थी। ऑफर फॉर सेल यानी OFS के तहत निवेशकों ने अंततः 12.64 करोड़ शेयरों की पेशकश की, जो NSE की कुल इक्विटी का 5.11 प्रतिशत है।
NSE के चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर आशीषकुमार चौहान के मुताबिक, कम वैल्यूएशन के स्तर पर नियामकीय जरूरतें पूरी करने के लिए कंपनी की करीब 4.1 से 4.25 प्रतिशत इक्विटी की पेशकश ही पर्याप्त थी। ड्राफ्ट प्रॉस्पेक्टस में प्रस्तावित 14.89 करोड़ शेयरों की तुलना में अंतिम OFS आकार कम रहा है। आईपीओ से करीब 21,494 करोड़ से 22,569 करोड़ रुपए जुटने का अनुमान है, जो पहले अनुमानित करीब 30,000 करोड़ रुपए से काफी कम है। इसकी प्रमुख वजह अपेक्षा से कम वैल्यूएशन है।
SBI और MS Strategic Mauritius की अगुवाई में कई मौजूदा शेयरधारकों ने RHP चरण में अपनी हिस्सेदारी बिक्री घटाई। वहीं SBI Capital Markets OFS में शामिल हुआ और उसने 87.8 लाख शेयर बिक्री के लिए रखे। अमित कुमार लोहिया ने OFS से अपना नाम वापस ले लिया। हालांकि CPPIB, Aranda Investments और कई बीमा कंपनियों समेत अन्य बड़े निवेशक अब भी OFS में शामिल हैं। एक निवेश बैंकर के मुताबिक, नए निवेशकों को निवेश के लिए तैयार करने की तुलना में मौजूदा शेयरधारकों को अपनी हिस्सेदारी बेचने के लिए राजी करना ज्यादा चुनौतीपूर्ण रहा।
यह आईपीओ पूरी तरह OFS है, यानी इससे मिलने वाली रकम NSE को नहीं मिलेगी। NSE का कोई प्रमोटर नहीं है और एक्सचेंज ने कहा है कि लागू लॉक इन नियमों के अधीन वह धीरे धीरे 100 प्रतिशत पब्लिक फ्लोट की दिशा में बढ़ेगा।
NSE का आईपीओ 17 सितंबर 2026 को सब्सक्रिप्शन के लिए खुलेगा और 21 सितंबर 2026 को बंद होगा। एंकर निवेशकों के लिए आवंटन 16 सितंबर को, यानी आईपीओ खुलने से एक दिन पहले किया जाएगा।
लिस्टिंग की तैयारी के बीच NSE अपने साप्ताहिक इंडेक्स डेरिवेटिव्स पर निर्भरता घटाने की दिशा में काम कर रहा है। वित्त वर्ष 2026 में इनका योगदान ऑपरेटिंग रेवेन्यू में 46 प्रतिशत रहा। ट्रांजैक्शन चार्ज अभी भी NSE की आय का सबसे बड़ा स्रोत हैं, लेकिन कुल राजस्व में उनकी हिस्सेदारी पांच साल पहले के 79 प्रतिशत से घटकर 70 प्रतिशत रह गई है।
NSE के अनुसार डेटा, कनेक्टिविटी और इंडेक्स जैसे नए रेवेन्यू सेगमेंट मिलकर करीब 11 प्रतिशत आय दे रहे हैं और इनकी वृद्धि तेज है। एक्सचेंज इलेक्ट्रॉनिक गोल्ड रिसीट्स, स्पेशलाइज्ड इन्वेस्टमेंट फंड्स और ETF जैसे क्षेत्रों में भी अवसर तलाश रहा है। वित्त वर्ष 2026 में ऑप्शंस से NSE के ऑपरेटिंग रेवेन्यू का 60 प्रतिशत हिस्सा आया। साथ ही टेक्नोलॉजी पर खर्च हर साल 17 से 18 प्रतिशत बढ़ने की उम्मीद है।
इस बीच, चौहान ने स्पष्ट किया कि NSE ने अपने शेयरों की ट्रेडिंग अपने ही प्लेटफॉर्म पर शुरू करने के लिए सेबी से मंजूरी नहीं मांगी है और एक्सचेंज फिलहाल नियामक के साथ पूरी तरह तालमेल में है।



