कीमती धातुओं के दाम एक बार फिर “धीरे-धीरे ऊपर और तेजी से नीचे” के पैटर्न पर चलते दिखे हैं। मेटल्स डेली के सीईओ रॉस नॉर्मन की मानें तो जनवरी में सोना, चांदी में तेज रैली और रिकॉर्ड ऊंचाइयां देखने को मिलीं, जबकि फरवरी में तेज करेक्शन, आंशिक रिकवरी और फिर नई अस्थिरता ने बाजार को दुविधा भरे कंसोलिडेशन फेज में ला खड़ा किया है।
नॉर्मन कहते हैं कि फिलहाल कीमतों की चाल मूलभूत कारकों से ज्यादा सट्टा प्रवाह से संचालित हो रही है। खासकर चीन के डेरिवेटिव कारोबार का प्रभाव बढ़ा हुआ है, जिससे दाम कई बार बुनियादी मांग-आपूर्ति से उलट दिशा में चलते दिखे। उनका कहना है कि ऐसे उतार-चढ़ाव में खुदरा निवेशक नुकसान उठाते हैं, संस्थागत निवेशक दूरी बना लेते हैं, औद्योगिक उपभोक्ता विकल्प तलाशते हैं और केंद्रीय बैंक भी सतर्क रुख अपना लेते हैं।
तकनीकी विश्लेषण के लिहाज से, किसी बड़ी गिरावट के बाद करीब 50% की रिकवरी को तेजी के जारी रहने का संकेत माना जाता है। अधिकांश धातुएं इस स्तर तक नहीं पहुंच सकीं और प्रमुख रेजिस्टेंस से पहले ही ठहर गईं। इससे बाजार में ‘एम्बर लाइट’ जैसा माहौल बना हुआ है—तेज रिकवरी बुल्स के लिए सकारात्मक है, लेकिन मजबूत अमेरिकी आंकड़े, डॉलर की मजबूती और फेड की दर कटौती में देरी जैसी चुनौतियों के बीच इसे निर्णायक तेजी नहीं माना जा सकता।
इस परिदृश्य में सोना सबसे बेहतर प्रदर्शनकर्ता बनकर उभरा है। यह हालिया ऊंचाई से केवल 12% नीचे है और 50% रिट्रेसमेंट स्तर पार कर चुका है। केंद्रीय बैंकों की खरीद, डॉलर से दूरी की प्रवृत्ति और संप्रभु कर्ज को लेकर चिंताएं सोने को संरचनात्मक समर्थन दे रही हैं। यूके, यूरोप और एशिया में बुलियन शोरूम में मांग बेहद मजबूत बताई जा रही है। भारत में प्रीमियम ऊंचे दामों के बावजूद दशक के उच्च स्तर के करीब हैं, हालांकि चीन में मौसमी मांग कुछ नरम पड़ी है।
दूसरी ओर, चांदी में सबसे ज्यादा कमजोरी दिखी है। जनवरी के 122 डॉलर प्रति औंस के रिकॉर्ड उच्च स्तर से यह अब भी करीब 38% नीचे है। नॉर्मन के अनुसार जनवरी की लगभग 60% तेजी मुख्यतः सट्टा आधारित थी, जिससे बाद में डी-लेवरेजिंग का दबाव आया। हालांकि, पिछले छह वर्षों से आपूर्ति घाटा और मजबूत औद्योगिक व ज्वेलरी मांग के बावजूद मौजूदा कीमतें इन कारकों से अलग दिख रही हैं।
सैमसंग सहित अन्य कंपनियों द्वारा सॉलिड-स्टेट बैटरियों का उत्पादन भविष्य में चांदी की मांग को नई दिशा दे सकता है। यदि 2035 तक करीब 10% वाहनों में प्रति कार लगभग 1 किलोग्राम चांदी का उपयोग होता है, तो 6,000 से 8,000 टन अतिरिक्त मांग पैदा हो सकती है, जो वैश्विक खनन आपूर्ति का लगभग एक-चौथाई होगी।



