सोने की कीमतों में पिछले पांच साल में 170% से ज्यादा की जबरदस्त तेजी आई है। कई लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या अब यह रैली थम सकती है? लेकिन J.P. Morgan के एक्सपर्ट्स का मानना है कि सोने के खिलाफ दलीलें अभी सही साबित नहीं होंगी।
जेपी मॉर्गन प्राइवेट बैंक की कृति गुप्ता और ग्लोबल इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट जस्टिन बीमैन के मुताबिक, सोने की तेजी के पीछे सबसे बड़ा कारण बढ़ती भू-राजनीतिक अस्थिरता है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद केंद्रीय बैंकों ने डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए बड़े पैमाने पर सोना खरीदा है। 2022 के बाद से सेंट्रल बैंकों की नेट खरीद दोगुनी हो चुकी है।
रिपोर्ट के अनुसार, अगर केंद्रीय बैंक अचानक सोना खरीदना बंद कर दें या बेचने लगें तो यह बड़ा जोखिम हो सकता है। इतिहास में 1999-2002 के दौरान ब्रिटेन और स्विट्जरलैंड द्वारा सोना बेचने से कीमतों में गिरावट आई थी। हालांकि, मौजूदा हालात में ऐसा होने की संभावना कम बताई गई है। 2025 में 95% केंद्रीय बैंकों ने संकेत दिया है कि वे अपने गोल्ड रिजर्व बढ़ाना चाहते हैं।
इमर्जिंग मार्केट देशों में अभी भी गोल्ड रिजर्व की हिस्सेदारी विकसित देशों से कम है। खासकर चीन, पोलैंड, भारत और ब्राजील लगातार सोना खरीद रहे हैं। चीन के कुल रिजर्व में सोना अभी केवल 8.6% है, जिससे आगे और खरीद की गुंजाइश बनती है।
दूसरा जोखिम रिटेल निवेशकों से जुड़ा है। अगर आम निवेशक अचानक सोने से दूरी बना लें तो कीमतों पर दबाव आ सकता है। लेकिन फिलहाल ETF होल्डिंग्स 2020 के रिकॉर्ड स्तर से नीचे हैं, यानी रिटेल निवेश अभी ‘ओवरहीट’ नहीं है।
जेपी मॉर्गन का अनुमान है कि 2026 में भी सेंट्रल बैंक हर तिमाही औसतन 585 टन सोना खरीद सकते हैं। कमजोर डॉलर, कम ब्याज दरें और वैश्विक अनिश्चितता जैसे फैक्टर सोने के लिए अभी भी सपोर्टिव माने जा रहे हैं। बैंक का मानना है कि सोने की तेजी भले सीधी रेखा में न चले, लेकिन लंबी अवधि का ट्रेंड अभी खत्म नहीं हुआ है।



